जब शब्द ही अपराधी घोषित कर दिए जाते हैं!

‘मौन रहना मतलब सहमति देना’

– लातिन कहावत

‘ऐसा वक्त़ आ सकता है कि हम नाइंसाफी को रोक सकने में सक्षम न हों, लेकिन ऐसा वक्त़ कभी नहीं होना चाहिए कि हम विरोध भी न करें’

[There may be times when we are powerless to prevent injustice, but there must never be a time when we fail to protest ..” ]– 

’ एली विजेल Elie Wiesel         

एली विजेल /1928-2016/ एक रोमानियाई यहूदी लेखक और कार्यकर्ता थे जो अपने संस्मरण ‘नाइट’ के लिए चर्चित रहे हैं, जो होलोकॉस्ट के दिनों के उनके अनुभवों को समेटती है।

‘बुद्धिजीवी आतंकवादी’ ‘ सीमा पार से आने वाले आतंकवादियों से अधिक ख़तरनाक होते हैं’ ये शब्द थे तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री मुरली मनोहर जोशी के जो उन्होंने भारतीय जनता युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते प्रगट किए थे। / 19 दिसम्बर 2001/ डॉ. जोशी ने ‘राष्ट्रवादी युवाओं का आवाहन भी किया था कि वह ‘दोनों किस्म के आतंकवादों से’ सख्ती से निपटें।’

दरअसल बमुश्किल एक सप्ताह भी नहीं बीता था जब भारत की संसद पर आतंकी हमला हुआ था और समूचा राष्ट्र स्तब्ध था और शोक में था और मानव संसाधन मंत्री के लफ्‍जों ने हंगामा खड़ा कर दिया था। उनके बारे में यह भी सोचा गया था कि संसद की सुरक्षा में चूक जैसी घटना- जिससे तत्कालीन वाजपेयी हुकूमत बचाव का पैंतरा अख्तियार करने के लिए मजबूर थी- से लोगों का ध्यान बांटने के लिए यह विवादास्पद वक्तव्य दिया गया था।

लगभग 25 साल का वक्फा गुजरने को है जब भारत के अग्रणी इतिहासकारों, विद्वानों, सार्वजनिक बुद्धिजीवियों को निशाना बनाते हुए उपरोक्त वक्तव्य दिया गया था, यहां तक कि अपने अनुयायियों को यह कह कर भड़काने की भी कोशिश की गयी थी कि इन/‘बुद्धिजीवी आतंकवादियों/ के साथ उसी प्रभावी ढंग से पेश आओ जैसे ‘सरहद पार से आए आतंकियों से निपटते हो।’

बाद के दिनों इन विवादास्पद, भडकाऊ बोलों पर प्रतिक्रिया देते हुए अग्रणी इतिहासकार प्रोफेसर रोमिला थापर ने इतना ही कहा था ‘बाद में सरकार ही गिर गयी, मगर किताबें तो चलती रहीं।’   https://www.iias.asia/the-newsletter/article/then-government-fell-books-continued-interview-romila-thapar ]

1 . विचारों पर पहरेदारों का वक्त़ !

जैसा कि हर कोई देख सकता है कि दक्षिण एशिया के इस हिस्से में विगत एक दशक में काफी बदलाव आए हैं। अब हमले का निशाना अधिक व्यापक और अधिक अनाकलनीय हो चला है। अब वह महज ‘वामपंथी’ या ‘प्रगतिशील लेखकों’ ‘इतिहासकारों’ तक सीमित नहीं है। हाल में कश्मीर के राज्यपाल की तरफ से जारी नोटिस में जिस तरह 25 किताबों को इकट्ठे बैन कर दिया है क्योंकि वह ‘छद्म आख्यान और अलगाववाद’ को बढ़ावा देती है – जिन्हें देश-विदेश के अग्रणी विद्वानों, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने लिखा है – जिनका विश्व नजरिया भी एक जैसा नहीं है, इसी बात की ताईद करता है। गौरतलब है कि यह किताबें सालों से, कुछ तो दशकों से चर्चा में रही हैं।   [https://indianexpress.com/article/india/arundhati-roy-noorani-jk-bans-publication-25-books-kashmir-propagating-secessionism-10174625/]

इन लेखकों की सूची में शामिल है अग्रणी कानूनविद एजी नूरानी, प्रसिद्ध उपन्यासकार अरुंधति रॉय, वरिष्ठ पत्रकार अनुराधा भसीन आदि। विचलित करने वाली बात यह है कि यह सभी किताबें अनुसंधान, रिसर्च और तथ्य संग्रहण पर लिखी गयी है, जिन्हें विश्व के जाने माने प्रकाशनों से प्रकाशित किया है। इतना ही नहीं भविष्य में किसी कानूनी विवाद से बचने के लिए भी इन प्रकाशनों ने पहले कानूनी सलाह भी ली है, यह अकारण नहीं कि इन 25 में से कोई भी किताब इसके पहले किसी पाबंदी का शिकार नहीं हुई है।

अनुराधा भसीन, जो कश्मीर टाइम्स की प्रबंध संपादक हैं और जिन्होंने कश्मीर मसले पर एक किताब लिखी है ‘कश्मीर -ए डिस्मेंटल्ड स्टेट’ / दिसम्बर 2021/ – जो बैन की गयी सूची में शामिल हैं – बताती हैं कि किताब में धारा 370 की समाप्ति के बाद की स्थिति का वर्णन है, तमाम लोगों से बात की गयी है, तमाम रिपोर्टों, किताबों का सहारा लिया गया है- इसके प्रकाशन के पहले प्रकाशन ने तीन बार इस किताब की कानूनविदों से समीक्षा करवायी गयी थी।

ग्रह मंत्रालय द्वारा जारी यह नोटिफिकेशन विचलित करने वाला है, जो न केवल यह दावा करता है कि यह किताबें न केवल ‘जम्मू-कश्मीर को लेकर छद्म आख्यान फैलाती हैं बल्कि अलगाववाद को बढ़ावा देती है।’ [‘propagate false narrative and secessionism in Jammu and Kashmir’ ] बल्कि यह भी कहता है कि उनकी बातें ‘युवाओं के मानस को प्रभावित करती है और उनमें ‘शिकायत की संस्कृति को, पीड़ित होने की भावना को और उग्रवादी किस्म की बहादुरी’’impact the psyche of youth by promoting (a) culture of grievance, victimhood and terrorist heroism’ की बातों को बढ़ावा देती है और किस तरह उन्होंने ‘ जम्मू और कश्मीर के ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है, उग्रवादियों का महिमामंडन किया है, सुरक्षा बलों को बदनाम किया है, धार्मिक ध्रुवीकरण को प्रेरित किया है’  ‘[c]ontributed to the radicalization of youth in J&K include distortion of historical facts, glorification of terrorists, vilification of security forces, religious radicalization, promotion of alienation, pathway to violence and terrorism etc’

यह पाया गया है कि यह 25 किताबें ‘अलगाववाद को बढ़ावा देती हैं और भारत की एकता और अखंडता को खतरे में डालती हैं, और इस वजह से भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 152, 196 और 197’ के प्रावधान उस पर लागू होते हैं।’ ‘“found to excite secessionism and endangering sovereignty and integrity of India, thereby, attracting the provisions of Sections 152, 196 & 197 of Bhartiya Nyaya Sanhita 2023.’

बिना किसी प्रक्रिया का अनुसरण किए हुए एक तरह से थोक भाव में इन किताबों पर एक साथ पाबंदी लगाना बेहद डरावना है, वह इस बात को साबित करता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को लेकर सरकार को कोई फिक्र नहीं है और यह एक सुनियोजित और सचेत प्रयास है कि कश्मीरी जनता की स्मृतियों को मिटा देना।

यह एक कवायद दिखती है कि कश्मीर में और कश्मीर के बारे में सभी किस्म के आलोचनात्मक चिन्तन पर पाबंदी लगा देना और एक तरह से कश्मीर को लेकर सभी किस्म के वैकल्पिक विमर्शों को, असहमति की आवाज़ों को दफना देना और महज सरकारी आख्यान को ही एकमात्र स्थापित करना।

2  .  यह नया नॉर्मल ?

कश्मीर को लेकर देश और विदेश के अग्रणी विद्वानों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा गहन अध्ययन और सर्वेक्षण के आधार पर लिखी गयी पचीस किताबों को एक साथ जब्त करने का आदेश देना, दरअसल सरकार के इस दावे पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है कि वहां ‘सब कुछ नॉर्मल है’। इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है कि धारा 370 की समाप्ति – जिसे मौजूदा सरकार ने छह साल पहले अंजाम दिया था – उसकी छठवीं सालगिरह के मौके पर ही यह ऐलान किया गया है।

अप्रैल माह में पहलगाम में कश्मीर देखने के लिए भारत भर से आए पर्यटकों पर आतंकियों ने अंधाधुंध गोलीबारी की थी और कई मुसाफिरों को मार डाला था, / अप्रैल 2025/जिस घटना को लेकर कश्मीर सरकार की एवं केन्द्र सरकार की काफी आलोचना हुई थी क्योंकि वह लगातार यही ऐलान करते रहे थे कि कश्मीर सामान्य हो चला है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस मसले पर अभी तक बचाव की मुद्रा में रहती आयी कश्मीर सरकार को यही लगता हो कि किताबों पर इकट्ठा पाबंदी लगाने जैसे कदम से उसकी सख्त इमेज बहाल होगी।

किताबों  पर पाबंदी लगाने के लिए जो वक्त़ चुना गया वह भी बेहद सांकेतिक था। कश्मीर घाटी में पहला राष्ट्रीय पुस्तक महोत्सव श्रीनगर में डाल सरोवर के सामने ही शुरू हुआ है, जिसका नाम ‘चिनार फेस्टिवल’ रखा गया है, जिसमें नेशनल बुक टस्ट, नेशनल कौन्सिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज तथा शेष भारत से चालीस से अधिक प्रकाशन शामिल हुए हैं।

एक साथ कश्मीर पर केन्द्रित 25 किताबों पर पाबंदी और उसी दौरान चिनार महोत्सव का आयोजन, यही संकेत देता है कि राज्य के लोग अब क्या पढ़ें, क्या याद रखें इसके बारे में भी यह सरकार तय करना चाहती है। कश्मीरी मूल के एक लेखक ने अपने साक्षात्कार में यही कहा कि किताबों पर एक साथ पाबंदी एक तरह से ‘चिन्तन को ही गिरफ्तार करना है।’

जाहिर है कि केन्द्र में और कई राज्यों में सत्ता पर अपनी पकड़ हासिल करने के बाद सत्ताधारी हुकूमत की यही कोशिश दिखती है कि इतिहास के एक अकेला, समरूप संस्करण को पेश किया जाए और सभी आलोचनात्मक आवाज़ों को खामोश कर दिया जाए – जो इतिहास का दूसरा पहलू बताती हैं। दरअसल उसकी यह कवायद एक तरह से सत्य और ज्ञान के प्रति उसके अपने डर को ही उजागर करती है और वह ‘किस कदर आतंकित है उन शब्दों से जो उसके झूठ का पर्दाफाश करते हैं। ’  [https://www.nationalheraldindia.com/national/jammu-kashmir-admin-bans-25-books-the-most-regressive-says-opp]

दरअसल यह बहुआयामी कोशिश है जहां देश दुनिया को लेकर महज अपनी ‘समझदारी’ को वैधता प्रदान करने की कवायद चल रही है। इसके तहत अपने विचार के, अपने एकांगी, वर्चस्ववादी एजेण्डे में पले बढ़े लोगों को, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेण्डे पर चलने वाले लोगों को शिक्षा संस्थानों में अहम स्थानों पर तैनात किया जाए, स्कूल कॉलेजों से लेकर विश्वविद्यालयों तक में अध्यापकों की जो नियुक्तियां होने वाली हैं उनमें भी इसी पैमाने को सबसे ऊपर रखा जाए, शिक्षा के पाठ्यक्रमों में बेहद मनमाने ढंग से परिवर्तन किए जाएं, उसके लिए शेष समाज में व्यापक बहस करने के सिलसिले को ही खंडित किया जाए।

उन्हें इस बात की भी फिक्र नहीं है कि इतिहास लेखन के सभी स्थापित पैमानों को धता बताते हुए, नया पाठ्यक्रम विकसित करने की उनकी कोशिशों की अंतरराष्ट्रीय जगत में भी हंसी उड़ रही है, देश-विदेश के अग्रणी विद्वानों ने इसे इतिहास के साथ खिलवाड़ बताया है।

‘आखिर किताबों की ज़ब्ती की अधिसूचना क्यों गैरकानूनी और असंवैधानिक है ?’

किताबों पर पाबंदी को लेकर पीयूसीएल/पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज/ द्वारा जारी विस्तृत बयान  [https://pucl.org/manage-press-stateme/pucl-response-to-the-banning-and-forfeiture-of-25-books-by-jk-government/], बहुत सारी बातें साफ करता है ::

एक, बयान में लिखा गया है कि संवैधानिक जनतंत्र इस सच्चाई पर आधारित होता है कि असहमति की आवाज़ें होती हैं और उनका सम्मान किया जाना चाहिए और राज्य सरकार को चाहिए कि वह इस बात को समझे कि ऐसे विचार हो सकते हैं, जिसके प्रति वह असहमत हो, मगर वह उनका सम्मान करे।

दो, वह बिना किसी किताब की अन्तर्वस्तु को संदर्भित किए एक साथ 25 किताबों पर पाबंदी के आदेश पर प्रश्न उठाती है और कहता है कि प्रथम नज़र में यही लग रहा है कि भारतीय न्याय संहिता धारा 98 के तहत प्राप्त अधिकारों का इस्तेमाल करके जारी यह आदेश औचित्यपूर्ण नहीं है और संविधान की धारा 19/2/ के तहत जिन वाजिब प्रतिबंधों को लागू करने की बात कही गयी है उसमें भी यह शामिल नहीं हो सकता।

तीसरे, वह सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश का उल्लेख करती है, जिसके अन्तर्गत मुंबई उच्च न्यायालय के उस आदेश को सही ठहराया गया था जिसने जेम्स लेन द्वारा लिखित ‘शिवाजी – हिन्दू किंग इन इस्लामिक इंडिया’ की जब्ती के आदेश को गलत ठहराया था। / स्टेट ऑफ महाराष्ट्र और अन्य बनाम संघराज दामोदर रूपवते’ /2010/ और वह इस निर्णय के प्रमुख पहलुओं को रेखांकित करता है।

‘‘निस्सन्देह, किसी अख़बार, किताब या दस्तावेज की जब्ती का आदेश, एक सख्त कदम है, जिसका असर न केवल संविधान के आर्टिकल 19/1/ए के तहत प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे अहम अधिकार पर पड़ता है, वह एक अदद पुलिस अफसर को यह अधिकार प्रदान करता है कि वह किताबों की प्रतियां या अन्य दस्तावेजों की जब्ती के नाम पर किसी भी ऐसे स्थान पर छापा डाले, जहां उसे संदेह है कि वह किताबें मिल सकती हैं, जो फिर लोगों की निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है। इसलिए इस प्रावधान को ठीक से समझने और उस पर अमल करने की आवश्यकता है।’

  [“Undoubtedly, the power to forfeit a newspaper, book or document is a drastic power inasmuch as it not only has a direct impact upon the due exercise of a cherished right of freedom of speech and expression as envisaged in Article 19(1)(a) of the Constitution, it also clothes a police officer to seize the infringing copies of the book, document or newspaper and to search places where they are reasonably suspected to be found, again impinging upon the right of privacy. Therefore, the provision has to be construed strictly and exercise of power under it has to be in the manner and according to the procedure laid down therein”.]

नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए विगत आधी सदी से प्रतिबद्ध और सक्रिय ‘पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज’ द्वारा जारी वक्तव्य इस बात को भी रेखांकित करता है कि किसी भी किताब की जब्ती का आदेश, पूरी किताब के अध्ययन के बाद ही लिया जा सकता है और राज्य‘ मनमाने ढंग से किताब के किसी हिस्से को उद्धृत करके’ यह दावा नहीं कर सकता।’ ध्यान रहे कि इसके पहले के फैसलों में आला अदालत ने ऐसे मामलों में किताब के चुनिन्दा हिस्सों का उद्धरण देकर उस पर पाबंदी लगाने की सरकार की कोशिशों को नाकाफी माना है और ऐसे निर्णयों को गैरकानूनी ठहराया है।

इस बात को दोहराने की जरूरत नहीं कि देश-विदेश के अग्रणी विद्वानों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा गहन अनुसंधान पर लिखी गयी किताबों को एक सिरे से जब्त करने का आदेश देना, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति सरकार की प्रचंड अवहेलना को ही उजागर करता है और उसके अहंकार का ही प्रदर्शन करता है। उसने पाबंदी के आदेश में यह बताने की जहमत नहीं उठायी कि इन किताबों को किस-किस आधार पर जब्त किया जाए और उसकी वजह क्या है?

निस्सन्देह पचीस किताबों पर इकट्ठे पाबंदी लगाने के इस आदेश की देश के प्रबुद्ध लोगों ने भर्त्सना की है, इसके बावजूद यह कहना पड़ेगा कि अभी भी इस आदेश की गंभीरता को लेकर शेष भारत में बहुत कम जानकारी है। इसके प्रभावों के बारे में, वह किस तरह देश के लोगों पर सेन्सरशिप लगा रहे हैं, इसकी भी कोई जानकारी लोगों में नहीं दिखती। पीयूसीएल का वक्तव्य किताबों की जब्ती के आदेश की राष्ट्रव्यापी व्याप्ति को भी बेपर्द करता है।  इस बयान के मुताबिक उपरोक्त आदेश के बाद अब…

1. पुलिस देश भर में किसी भी स्थान पर छापा डाल कर इन 25 किताबों को ढूंढ सकती है और जब्त कर सकती है।

2. इस नोटिफिकेशन को डायरेक्टर अर्काईव, आर्कियोलॉजी एण्ड म्यूजियम और डायरेक्टर ऑफ लाइब्रेरीज को भी भेजा गया है, जो इस बात को सुनिश्चित करेंगे कि कश्मीर पर प्रकाशित उपरोक्त साहित्य सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध पुस्तकालयों से गायब हो जाए। इस आदेश के तहत घर भी जांच और जब्ती से मुक्त नहीं हैं।

3. इस प्रावधान को ठीक से पढ़ें तो इसका मतलब यही निकलता है कि उसे देश के पैमाने पर लागू किया जा सकता है, जिसके तहत जम्मू और कश्मीर की पुलिस संम्बधित ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट से संपर्क करेगी और देश की किताबों की दुकानों से इस किताब को जब्त करने के लिए वारंट हासिल करेगी।  

इस बात का आकलन करने में कोई कठिनाई नहीं होगी कि कश्मीर के हालात पर आलोचनात्मक जांच करने या जानकारी इकट्ठा करने के प्रयासों पर इसका कितना विरोधी असर पड़ेगा।

कोई भी स्वस्थ चित्त, समझदार व्यक्ति पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की इस मांग से सहमत होगा:

1 . इन पच्चीस किताबों की जब्ती के आदेश को जम्मू और कश्मीर सरकार तत्काल वापस ले।

2 . भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 152 को निरस्त किया जाए क्योंकि वह और कुछ नहीं बल्कि नए अनौपनिवेशिक आवरण में देशद्रोह का पुराना कानून ही है।

[https://pucl.org/manage-press-stateme/pucl-response-to-the-banning-and-forfeiture-of-25-books-by-jk-government/

4 . विचारों को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता !

विश्लेषकों ने इस बात को सही नोट किया है कि ‘किताबों पर पाबंदी दरअसल उस व्यापक मुहिम का ही हिस्सा है, जो अगस्त, 2019 में धारा 370 की समाप्ति के साथ शुरू हुई – जिसका मकसद था कश्मीर की स्वायत्तता और पहचान को खत्म करना।’ वह इस बात को भी नोट करते हैं कि किस तरह इस अंतराल में मीडिया का गला घोंटा गया है, पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया है, अखबारों के दफ्तरों पर छापे डाले गए हैं, आलोचनात्मक आवाज़ों को खामोश किया गया है।’ वह डिजिटल सेन्सारशिप को किस तरह सख्ती से लागू किया जाता है इसकी भी चर्चा करते हैं, जिसके तहत न केवल ‘अक्सर इंटरनेट सेवाएं बन्द कर दी जाती हैं; सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध लगाया जाता है; इसी का हिस्सा है सांस्कृतिक विलोपन/कांट छांट cultural erasure जिसमें अलग-अलग लैण्डमार्क ठिकानों के नाम बदले जा रहे हैं, किताबों का पुर्नलेखन किया जा रहा है और अब उन पर पाबंदी भी लग रही है।’  [https://kashmirtimes.com/opinion/comment-articles/banning-truth-war-on-kashmirs-memory]

वैसे किताबों पर पाबंदी की भी एक लम्बी और स्याह विरासत है। हम चाहें तो बीती सदी की चौथी दहाई के उस दौर को याद कर सकते हैं, जब नात्सी जर्मनी में हिटलर सत्ता में आया था और ‘राष्ट्र रक्षा के नाम पर’ यहूदी, सोशलिस्ट और लिबरल विचारकों की किताबें जलायी जा रही थीं /1933/

उन्हीं दिनों प्रख्यात लेखक और समाजवाद की कार्यकर्ता हेलेन केलर – जिनकी किताब भी ‘हाउ आई बीकेम ए सोशलिस्ट’ भी नात्सियों ने आग के हवाले की थी, जर्मन छात्रों को सम्बोधित करते हुए एक खुला पत्रा लिखा था ‘:

‘आप भले मेरी किताबें और यूरोप के सबसे उन्नत मस्तिष्कों की किताबें जला देंगे, लेकिन उन विचारों का क्या जो उन किताबों में समाये थे और जो करोड़ों रास्तों से आगे बढ़ चुका है और बढ़ता ही रहेगा’’

– हेलेन केलर, एन ओपन लेटर टू जर्मन स्टूडेंण्टस

“You may burn my books and the books of the best minds in Europe, but the ideas those books contain have passed through millions of channels and will go on,”

https://slate.com/human-interest/2013/05/helen-keller-her-scathing-letter-to-german-students-planning-to-burn-her-book.html

उन्होंने आगे लिखा था ‘‘इतिहास से आप ने कुछ भी नहीं सीखा है, अगर आप सोचते हों कि आप विचारों को मार सकते हो। तानाशाहों ने इसके पहले भी इसे अंजाम देने की कोशिश की है और फिर विचार उठ खड़े हुए हैं जिन्होंने उनको नष्ट किया है।’History has taught you nothing if you think you can kill ideas. Tyrants have tried to do that often before, and the ideas have risen up in their might and destroyed them,” [https://www.newsclick.in/History-Conservative-Strikes-Books]

किस तरह टर्की में ‘‘2016 की असफल बग़ावत के बाद पुस्तकालयों से हजारों किताबों को हटा दिया गया, कुछ किताबों को महज इसलिए कि उनमें पेनसिल्वानिया लिखा था – जिसका संदर्भ निर्वासित धर्मगुरू फेतुल्लाह गुलेन से था, जो वहां रहते हैं। मकसद बताया गया था कि यह सब सुरक्षा के लिए किया जा रहा है ; मगर असली मकसद था असहमति को खामोश कर देना।’

https://kashmirtimes.com/opinion/comment-articles/when-books-become-threat-who-fears-kashmirs-written-word

क्या किताबें – जिन्हें ज्ञान का भंडार कहा जाता है और जो लोगों को सोचने के लिए मजबूर करती आयी हैं, इस हमले से बच सकेंगी?

शायद फैहरेनहीट फिल्म का आखरी दृश्य इसका जवाब देता प्रतीत होता है।  [https://www.newsclick.in/History-Conservative-Strikes-Books]

फैहरेनहीट 451’ !

यही उस फिल्म का नाम है जो साठ के दशक के मध्य में /1966/ में रिलीज हुई थी।

चर्चित फ्रेंच निर्देशक टुफो ज्तनिनिजए द्वारा निर्देशित इस एकमात्र इंग्लिश फिल्म की तरफ उस वक्त़ लोगों का अधिक ध्यान नहीं गया था। प्रख्यात अमेरिकी लेखक रे ब्रेडबरी के इसी नाम से प्रकाशित एक उपन्यास /1951/ पर आधारित यह फिल्म उस भविष्य की कल्पना करती है जब किताबें गैरकानूनी घोषित की जाएंगी और दमकल विभाग वाले उन तमाम किताबों को जला देंगे, जो उनके हाथ में लगती हैं। फैहरेनहीट 451 दरअसल उस तापमान का आंकड़ा है जब किताबें जलती हैं।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका में जो कम्युनिस्ट विरोध की उन्मादी मुहिम सरकार की शह पर चल पड़ी थी, जब बड़े-बड़े लेखकों, कलाकारों, सांस्कृतिक कर्मियों को जबरदस्त प्रताड़ना से गुजरना पड़ा, एक ऐसा दौर जब ‘लोगों को अपने साये से भी डर लगने लगा था’, उस पृष्ठभूमि में यह उपन्यास लिखा गया था, जिसने शोहरत की बुलंदियों को छुआ है। अब तक उसकी पचास लाख प्रतियां बिक चुकी हैं।

केन्द्र का मुख्य पात्र गाय मोन्टाग, जो खुद एक फायरमैन है जो खुद भी किताबों को जलाने की मुहिम में सक्रिय रहता है, वह पड़ोसी पुस्तक प्रेमी परिवार की बेटी से बातचीत के बाद बदल जाता है। और फिर घर छोड़ देता है और ग्रामीण इलाके में पहुंचता है, जहां उसकी मुलाकात उस विशाल समूह से होती है जो बुक पीपल नाम से अपने आप को सम्बोधित करता है, जिन्होंने किताबों को बचाए रखने के लिए एक अलग किस्म की पहल की है।

गाय मोंटाग को भी एक किताब मिलती है और वह तुरंत उसे याद करने में जुट जाता है।

(सुभाष गाताडे लेखक, अनुवादक, न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव (एनएसआई) से संबद्ध वामपंथी कार्यकर्ता हैं)

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